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रमजान का महीना इस्लाम में सबसे खास और फजीलत वाला माना जाता है। इस्लामी कैलेण्डर में 9वें महीने को रमजान कहा जाता है। रमजान अरबी शब्द और इस्लामिक महीना है। भारत में माहे रमजान के पाक महीने की शुरुवात 24 मार्च 2023 से शुरु हो चुकी है। और रोजेदार 25 मार्च से रोजा रख रहे हैं।
रमजान के पवित्र महीने में मुस्लमान रोजा रखते हैं। रमजान रहमतों और बरकतों का महीना है। इस्लाम को मानने वाले हर बालिग शख्स पर रोजा फर्ज यानि जरूरी है। रमजान के महीने में ही मुसलमानों के लिए सबसे पाक किताब कुरान को अल्लाह ने उतारा है। इस्लाम में रोजा रखने के नियम के बारे में बताया गया है।
क्या होता है रोजा
लोगों के मन में सवाल उठता है कि, रोजा क्या होता है, इसको रखने का तरीका क्या है। इसको लेकर कई बार लोगों के मन में सवाल उठते हैं। रोजा को अरबी भाषा में सौम कहा जाता है। सौम का मतलब होता है रुकना, ठहरना यानी खुद पर नियंत्रण रखना या काबू करना।
फारसी में उपवास को रोजा कहते हैं। भारत में मुस्लिम समाज पर फारसी प्रभाव अधिक होने के कारण फारसी का उपवास शब्द ही प्रयोग किया जाता है।
दरअसल रोजा उसी तरीके से रखा जाता है जैसे हिन्दू धर्म में व्रत और इसाई धर्म में फास्ट किया जाता है। बस फर्क इतना है कि, रोजे में कुछ भी खाने-पीने की इजाजत नही होती है। सूरज निकलने से लेकर सूरज ढलने तक रोजेदार न तो पानी पीते हैं, न कुछ खाते हैं।
रोजे के दौरान खाने पीने की चीजों से दुरी रखने के साथ आंख, कान, नाक और मुह सभी चीजों का रोजा होता है। इसका मतलब है कि, बुरा मत कहो, किसी के बारे में बुरा मत सोचों और किसी का दिल मत दुखाओ।
रोजा की हालत में किसी तरह के सेक्स संबंध बनाने की मनाही है। रात में अगर ऐसा होता भी है, तो दंपत्ति को पहले पाक होना जरूरी है। रोजा बुराइयों से दूर रखता है, और इन्सान की नेकी की राह पर चलने का एक अभ्यास है।
कई बार लोग कुछ खा-पी लेते हैं, और इस हालत में डरकर रोजा तोड़ देते हैं। परन्तु ऐसा करना अगर रोजे के दौरान आपने भूलवश कुछ खा-पी लिया है तो नियम कहता है कि, आपका रोजा फिर भी हो जायेगा।
इस्लाम में रोजा रखने की परम्परा कैसे और कब शुरू हुई
कहा जाता है कि, इस्लामिक कैलेण्डर के 9वें महीने रमजान में रोजा रखने की शुरुवात दूसरी हिजरी में हुई है। कुरान की दूसरी आयत सूरह अल बकरा में साफ तौर पर कहा गया है कि, रोजा तुम पर उसी तरह से फर्ज किया जाता है, जैसे तुमने पहले की उम्मत पर फर्ज था।
मोहम्मद साहब मक्के से हिजरत कर मदीना पहुचने के 1 साल के बाद मुसलमानों को रोजा रखने का हुक्म आया। इस तरह से दूसरी हिजरी में रोजा रखने की परंपरा इस्लाम में शुरू हुई।
कहा जाता है कि, रमजान में अल्लाह ने 50 दिनों का रोजा उम्मत फर्ज किया है। पैगम्बर मोहम्मद को जब अल्लाह ने अपना नबी बनाया तो अल्लाह ने उनके उम्मद पर 50 दिन का रोजा रखने का हुक्म दिया था। परन्तु पैगम्बर मोहम्मद ने अल्लाह से गुजारिश की कि, मेरे उम्मत 50 दिनों का रोजा नहीं रख पाएंगे।
तब अल्लाह ने पैगम्बर की गुजारिश कुबूल करते हुए रमजान में 30 दिनों का रोजा उनकी उम्मत पर फर्ज किया। वहीं शेष 20 रोजा नफिल किया जिसे ईद के पश्चात 6 रोजा, मुहर्रम, बकरीद, शाबान, रजब इत्यादि महीने में रखे जाते हैं। रमजान की तरह नफिल रोजा में भी सवाब है। अगर कहें रमजान की तो, बालिग मुसलमानों पर 30 रोजे फर्ज किये गये हैं।
किन लोगों को रोजा रखना जरुरी है, और किन्हें रोजा रखने की छुट है
कुरान और इस्लाम में कहा गया है कि, हर बालिग मर्द और औरत पर रमजान का रोजा रखने का फर्ज है। लेकिन जो लोग बीमार हैं, बहुत छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाओं को रोजा रखने की छुट होती है।
महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान भी रोजा रखने की छुट होती है। परन्तु मासिक धर्म में जितने दिनों का रोजा छुट जाता है, उतने ही रोजे बाद में रखकर इसे पूरा किया जाता है।
और जो व्यक्ति हमेशा बीमार रहता है, तो उसे 30 दिन रोजे के बदले 60 गरीबों को पौने 2 किलो गेहूं या इसके बराबर बाजार की कीमत पर रूपये अदा करने की बात कही गयी है। कोई बीमार व्यक्ति अगर ठीक महसूस करे तो वह पहली फुर्सत में रोजा रख सकते हैं।
कोई व्यक्ति अगर यात्रा कर रहा है और उसे रोजा रखने में परेशानी है तो ऐसे में यात्रा समाप्त होते ही रोजा रखने की बात कही गयी है। अन्यथा वह गुनाहगार हो जाता है।
ऐसे लोग जो बालिग और शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी रोजा नहीं रखते, ऐसे लोग गुनाहगार होते हैं। और इन्हें जहन्नुम नसीब होती है। कहा तो यह भी जाता है कि, जो लोग रमजान के पुरे महीने में रोजा नहीं रखते। वह ईद की नमाज भी राजदारों के साथ नहीं पढ़ सकते।
रमजान का महत्व
इस्लाम में रमजान का काफी महत्व है। इस पाक महीने में अल्लाह जन्नत के दरवाजे खोल देता है व् जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। वहीं शैतान को कैद कर लेता है। इस महीने में अल्लाह ने कुरान नाजिल किया है। जिसमे जिन्दगी व्यतीत करने के तरीके अल्लाह ने बताएं हैं। नफ्ल का काम करने पर अल्लाह फर्ज अदा करने का सवाल और फर्ज अदा करने पर 70 फर्जों का सवाब देता है।
रमजान का महीना सब्र व् सुकून का महीना है। इस महीने में अल्लाह की खास रहमतें बरसती हैं। अल्लाह रमजान माह का एहतराम करने वाले लोगों के पिछले सभी गुनाह माफ़ कर देता है। इस महीने में की गयी इबादत और अच्छे कामों का 70 गुना पुण्य मिलता है।
कुरान इसी महीने में दुनिया में आया जो लैलातुल क़द्र है। रमजान के महीने में रात कौन सी है। इसे साफ-साफ नहीं बताया गया है। अनुमान है कि, रमजान के आखिरी असरा में यानि 10 दिनों में ताक रातें जैसे -21, 23,25,27 में से कोई एक रात है।

क्या है रोजा रखने के नियम
रमजान में रोजेदार की रात में तीसरे पहर में अजान से पहले उठकर सहरी करनी चाहिए। इसके बाद रोजे की नियत की जाती है । फिर सुबह की नमाज अदा करें। रोजाना की तरह दिनभर अपने काम-काज करें।
और दिन में ही जोहर व् असर की नमाज अदा कर कुरान की तिलावत करें। शाम में अजान होने के बाद इफ्तार करने यानी रोजा खोलने के बाद तुरंत मगरिब की नमाज अदा करें। रात में ईशा की नमाज के बाद तरावीह पढकर सोयें। रमजान के महीने में रोजा रखने और अल्लाह की इबादत करने के साथ ही गरीब, लाचार, और जरुरतमंदों की मदद करने से आम दिनों के मुकाबले 70 गुना अधिक सबाब मिलता है।
रमजान में दान करना आवश्यक है
जकात [दान] का खास महत्व है। अगर किसी के पास साल भर उसकी जरुरत से अलग साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर की नकदी या कीमती सामान है। तो उसका ढाई% जमात यानि दान के रूप में गरीब या जरूरतमंद को दिया जाना चाहिए। ईद पर फितरा हर मुस्लमान को करना चाहिए। इसमें 2 किलो 45 ग्राम गेहूं गरीबों को दें, या फिर उसकी कीमत तक की रकम गरीबों में दान की जानी चाहिए।
क्या है तरावीह
तरावीह भी रमजान की इबादत का एक हिस्सा है। ये नमाज सिर्फ रमजान में ही अदा की जाती है। तरावीह में 20 रकात नमाज पढते हैं। और हर 4 रकात के बाद थोड़ा आराम करते हैं। तरावीह का मतलब है लम्बी नमाज।
क्या होती है सहरी
रोजा सहर के वक़्त फज्र से शुरू होकर शाम को भग्रिब की अजान तक चलता है। सहर का मतलब होता है सुबह। उस वक़्त हम रोजे की नियत कर मामूली रूप से रस्म अदायगी के तौर पर कुछ खाते। सुबह के इसी खाने को सहरी कहा जाता है। फज्र की नमाज शुरू होने तक सहरी की जा सकती है।
क्या होती है इफ्तारी
इफ्तार का मतलब किसी बंदिश को खोलना होता है। रमजान के रोजों में दिन भर खाने-पीने की बंदिशें होती हैं। और शाम को भग्रिब की अजान होते ही ये बंदिशें खत्म हो जाती हैं। इसलिए इसे इफ्तारी कहा जाता है। खजूर से इफ्तार करने की इस्लाम में अफजल [ प्राथमिकता] माना जाता है।